ओ रे मालिक...
कौन सुने अब पीर ये मन की...
ओ रे सांवरिया...
अरे कोई ना पूछा हाल दिल का,
भीतर पीर पुरानी रे...
हँसते चेहरे सबने देखे,
किसने बात जानी रे...
अरे कोई ना पूछा हाल दिल का...
मन रोए अंजानी रे...
माटी का तन, माया का मेला,
झूठी दुनियादारी रे...
जिसको अपना समझ लिया था,
निकला वही शिकारी रे...
भीड़ लगी इस जग के अंदर,
मन फिर भी वीरानी रे...
अरे कोई ना पूछा हाल दिल का,
भीतर पीर पुरानी रे...
राम नाम की छाँव ना मिलती,
धूप बड़ी संसार की रे...
मन पंछी थक हार के बैठा,
राह तके दरबार की रे...
अरे कोई ना पूछा हाल दिल का...
मन रोए अंजानी रे...
दर्द छुपाए फिरते फिरते,
उम्र हुई दीवानी रे...
अरे कोई ना पूछा हाल दिल का...
भीतर पीर पुरानी रे...
साँस-साँस में बोझ पड़ा है,
कर्मों की गठरी भारी रे...
अपनों ने ही चोट लगाई,
किसको बात हमारी रे...
अब तो तेरे द्वार पे मालिक,
आँख लगी बेचैनी रे...
अरे कोई ना पूछा हाल दिल का,
मन रोए अंजानी रे...
ओ रे मालिक...
मनवा थक के हार गया रे...
अरे कोई ना पूछा...
हाल दिल का...